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मालू गोत्र की उत्पत्ति परमार वंशीय राजपूत कुल से हुई ओसिया नगर पर परमारो का शासन था और ओसिया में 1444 गोत्र के राजपूत व अन्य जाति के लोग निवास करते थे द्य ओसिया नगर के सभी ग्रामवासी अधर्मी और मांसाहारी थे और नगर में धर्म का अभाव था सभी अज्ञानी थे द्य उस समय में ओसिया नगर में खरतरगच्छ के श्वेताम्बर जैन साधु रत्न सूरी जी महाराज साहब अपने एक शिष्य के साथ चौमासा किया तथा महाराज साहब चार महीने चौमासे में तपस्या में लिन हो गए और शिष्य गोचरी के लिए नगरी में गया द्य गोचरी के वजाय उसे त्रिष्कार अपमान मिला द्य ओसिया नगर के वासियो का मानना था जहाँ पर साधु .साध्वी चौमासा करेंगे द्य वंहा पर बरसात नहीं होगी अकाल पड़ेगा और इस तरह साधु. साध्वी ;जैनद्ध को ढूढिया कंह कर त्रिस्कार करते द्य इस कारण शिष्य ने गोचरी नहीं मिलने के कारण जंगल से लकड़ियाँ काट कर नगर में बेचता था और उससे मिलने वाले धन से गुण .चने ख़रीद कर अपनी भूख मिटाता था द्य इस तरह चार महीने चौमासा बितने के बाद महाराज साहब तपस्या से उठे तो अपने शिष्य की दुर्दशा देखकर क्रोधित व दुखी हुवे और कपास की बत्ती से पिईना सर्प बनाया जो महाराज साहब की आज्ञा से राजा के राजकुमार के प्राण पिलाये राजा सोमेश्वर अपने पुत्र को मूर्छित देखकर दुखी हुआ महाराज साहब ने अपने शिष्य को राजा के पास भेजा शिष्य ने राजा से कहा की आपके पुत्र के प्राण साधुजी ला सकते है राजकुमार को जिन्दा कर सकते है यह सुनकर राजा महाराज साहब के पास जाकर राजकुमार के प्राण दान की विनती की तो महाराज साहब श्री रत्नसूरी ने राजा से दो वचन मांगे की प्रथम वचन राजा प्रजा सभी को जैन धर्म स्वीकार करना होगा द्य जैन धर्म का पालन करना होगा द्य दूसरा वचन ओसिया नगर में कोई ग्रामवासी ;जैनद्ध निवास नहीं करेगा राजा प्रजा ने दोनों वचन मन लिए महाराज साहब ने प्राण सर्प से वापस डलवा दिए और ओसिया नगर में 1444 गौत्र से सभी नागरिको को जैन धर्म स्वीकार किया द्य पड़िहार . राजपूत वंश से पड़इया करनोत वंश से कर्णावत पेंतीस जात के पवार वंश से ३५ जात के बोहरा की उतपत्ति हुई द्य मालू जी धरावीश राजपूत परमार वंश से 9वी शताब्दी से संवत 884 वार बुधवार चैत्र सुद ;बारस द्ध को ओसिया के सभी राजा प्रजा सहित 1444 गौत्र के नागरिको ने जैन धर्म स्वीकार क्या मालू जी धरावरिस परमार वंशीय राजपूत कुल में मालू जैन गोत्र की स्थापना हुई द्य मालू जी के चार पुत्र और एक पुत्री थी 1. कनाजी २. खेतजी ३ आसकरण ४ तेजसी ५ मिरगाबाई और महाराज रत्नसूरी जी के दूसरे वचन के अनुसार ओसिया में कोई जैन निवास नहीं करेगा द्य ओसिया से 1444 गोत्र के ओसवाल भारत वर्ष के कई जगहों पर फ़ैल गए द्य मालूजी के लड़के ओसिया से तिवरी नगर बसाया द्य मालाणी वसी मालाणी मालवा ए गुजरात जयपुर ए फलोदी ए बीकानेर अमरकोट ;पाकिस्तानद्ध आदि स्थानों पर मालू परिवार निवास करते है रायमल जी ;कनाजी मालू से ;रायमालू द्धऔर खेतजी से ;खड़मालूद्ध बने श्री मालू गोत्र की कुल देवी सचियामाता ओसिया गच्छ खरतरगच्छ है इसका 1444 गोत्र जैन धर्म स्वीकार करने का उल्लेख हेमचद्र सूरी महाराजसा ने ग्रन्थ जैन ;ग्रन्थद्ध त्रिष टि शलाका पुरुष चरित्रम में है यह इतिहास राव जी ;भाट द्ध श्री औंकारचंद .अचलदासजी गांव आनन्दपुरा कालू जिला पाली मारवाड़ से लिया गया है " .